Wednesday, April 26, 2023

 

 ਮਿਲਦਾ ਨਾ ਕੋਈ ਹੱਲ ਹੁਣ ਤੇਰੀ ਕਿਤਾਬ 'ਚੋਂ

ਮਿਲਦਾ ਨਾ ਕੋਈ ਹੱਲ ਹੁਣ ਤੇਰੀ ਕਿਤਾਬ 'ਚੋਂ
ਸੌ ਸੌ ਸਵਾਲ ਨਿਕਲਦੇ ਇਕ ਇਕ ਜਵਾਬ ਚੋਂ

ਚਿੱਟੇ ਦੀ ਕਾਲੀ ਖ਼ਬਰ ਹੀ ਹੁਣ ਸੁਰਖੀਆਂ 'ਚ ਹੈ
ਬਾਕੀ ਦੇ ਰੰਗ ਹੋ ਗਏ ਮਨਫ਼ੀ ਪੰਜਾਬ ਚੋਂ

ਰੁਲਦੇ ਮਾਸੂਮ ਤਿਤਲੀਆਂ ਦੇ ਖੰਭ ਥਾਂ-ਕੁਥਾਂ
ਖ਼ੁਸ਼ਬੂ ਤਾਂ ਚੋਰੀ ਹੋ ਗਈ ਹਰ ਇਕ ਗੁਲਾਬ 'ਚੋਂ

ਤਾਰਾਂ ਤਾਂ ਤੜਪੀਆਂ ਨੇ ਕੁਛ ਮੇਰੇ ਵਰਾਗ ਨਾਲ
ਵੇਖੋ ਕਿ ਕਿਹੜਾ ਰਾਗ ਹੁਣ ਨਿਕਲੇ ਰਬਾਬ 'ਚੋਂ

 

ਮੈਂ ਬਣ ਕੇ ਹਰਫ ਇਕ ਦਿਨ ਕਾਗਜ਼ਾਂ ’ਤੇ ਬਿਖਰ ਜਾਵਾਂਗੀ

ਮੈਂ ਬਣ ਕੇ ਹਰਫ ਇਕ ਦਿਨ ਕਾਗਜ਼ਾਂ ’ਤੇ ਬਿਖਰ ਜਾਵਾਂਗੀ
ਕਲਮ ਦੀ ਨੋਕ ’ਚੋਂ ਕਵਿਤਾ ਦੇ ਵਾਂਗੂੰ ਉੱਤਰ ਜਾਂਵਾਗੀ

ਤੇਰੀ ਰੂਹ ਤੱਕ ਨਾ ਪਹੁੰਚੇ ਮੇਰੇ ਕਦਮਾਂ ਦੀ ਆਹਟ ਵੀ
ਤੇਰੇ ਦਿਲ ਦੀ ਗਲ਼ੀ ’ਚੋਂ ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਗੁਜ਼ਰ ਜਾਵਾਂਗੀ

ਮੈਂ ਨਾਜ਼ੁਕ ਸ਼ਾਖ ਹਾਂ ਕੋਈ ਹੈ ਗਮ ਦੀ ਗਰਦ ਮੇਰੇ ਤੇ
ਕਿਸੇ ਬਰਸਾਤ ਵਿਚ ਮੈਂ ਫੇਰ ਇਕ ਦਿਨ ਨਿਖਰ ਜਾਂਵਾਗੀ

Friday, April 7, 2023

DST NCC


 

Fateh 2023






 

 हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में

ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो

उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो

हमेशा देर कर देता हूँ मैं

मदद करनी हो उस की यार की ढारस बंधाना हो

बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो

हमेशा देर कर देता हूँ मैं

बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो

किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो

हमेशा देर कर देता हूँ मैं

किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो

हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो

हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में.....



Ghazal

 मैं ढूँडता हूँ जिसे वो जहाँ नहीं मिलता

नई ज़मीन नया आसमाँ नहीं मिलता


नई ज़मीन नया आसमाँ भी मिल जाए

नए बशर का कहीं कुछ निशाँ नहीं मिलता


वो तेग़ मिल गई जिस से हुआ है क़त्ल मिरा

किसी के हाथ का उस पर निशाँ नहीं मिलता


वो मेरा गाँव है वो मेरे गाँव के चूल्हे

कि जिन में शोले तो शोले धुआँ नहीं मिलता


जो इक ख़ुदा नहीं मिलता तो इतना मातम क्यूँ

यहाँ तो कोई मिरा हम-ज़बाँ नहीं मिलता


खड़ा हूँ कब से मैं चेहरों के एक जंगल में

तुम्हारे चेहरे का कुछ भी यहाँ नहीं मिलता


Saturday, March 27, 2010

ज़िन्दगी से बड़ी सज़ा ही नहीं / कृष्ण बिहारी 'नूर'


ज़िन्दगी से बड़ी सज़ा ही नहीं,
और क्या जुर्म है पता ही नहीं
इतने हिस्सों में बट गया हूँ मैं,
मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं
सच घटे या बड़े तो सच न रहे,
झूठ की कोई इन्तहा ही नहीं
जड़ दो चांदी में चाहे सोने में,
आईना झूठ बोलता ही नहीं

Saturday, February 27, 2010

ਮੌਤ ਕਿਉਂ ਆਉਂਦੀ ਹੈ...../ਗੁਰਿੰਦਰ ਗਿੰਦਾ

ਆਦਮੀ ਨੂੰ ਇਹ
ਅਹਿਸਾਸ ਕਰਾਉਣ ਲਈ
ਕਿ ਹੁਣ ਤੱਕ ਉਹ
ਜ਼ਿੰਦਾ ਸੀ............
ਮੌਤ ਆਉਂਦੀ ਹੈ।

ਮੌਤ/ਗੁਰਿੰਦਰ ਗਿੰਦਾ

1
ਮੱਨੂਖ ਦੇ
ਜ਼ਿੰਦਾ ਹੋਣ ਦਾ
ਇਕੋ ਇਕ ਪ੍ਰਮਾਣ
ਮੌਤ........

2
ਧਰਮ
ਅਰਥ
'ਤੇ ਕਾਮ
ਸ਼ਕਤੀਆਂ ਖੋਹਣ
ਵਾਲੀ ਤਾਕਤ।

ਮਿਲਾਪ/ਗੁਰਿੰਦਰ ਗਿੰਦਾ

ਤੂੰ ਭਾਵੇ ਚਲਾ ਗਿਆ
ਮੇਰੇ ਮੰਨ ਦੀ ਧਰਤ ਤੇ
ਆਪਣੀ ਸ਼ਖ਼ਸੀਅਤ ਦਾ
ਮੀਂਹ ਵਰਸਾ
ਪਰ ਅੱਜ ਵੀ
ਮੇਰੇ ਮੰਨ ਦੀ
ਧਰਤ 'ਚੋਂ
ਉਠ ਰਹੀ ਮਿੱਟੀ ਦੀ ਮਹਿਕ
ਗਵਾਹ ਹੈ ਕਿ ਅਸੀਂ
ਮਿਲੇ ਸੀ ਕਦੇ
ਸਮੁੰਦਰ 'ਚ ਮਿਲਦੀ
ਨਦੀ ਵਾਂਗ।

Thursday, February 25, 2010

ਗਜ਼ਲ/GURINDER GINDA

ਦੋਸਤੋ ਇਸ਼ਕ ਦੇ ਰਾਹ ਔਖੇ,
ਚਲਨਾਂ ਇਹਨਾਂ ਤੇ ਹੁੰਦਾ ਆਸਾਨ ਨਹੀਂ
ਜਿਹੜੇ ਇਸ਼ਕ ਦੇ ਰਾਹ ਤੇ ਤੁਰ ਪੈਂਦੇ,
ਹੁੰਦਾ ਰੱਬ ਵੀ ਉਨ੍ਹਾਂ ਤੇ ਮਿਹਰਵਾਨ ਨਹੀਂ
ਇਸ਼ਕ ਦੇ ਇਸੇ ਰਾਹ ਉਤੇ,
ਘੜ੍ਹਾ ਸੋਹਣੀ ਨਾਲ ਵੈਰ ਕਮਾ ਬੈਠਾ
ਮਿਰਜ਼ਾ ਚੱਲ ਕੇ ਇਸੇ ਰਾਹ ਉਤੇ,
ਧੋਖਾ ਯਾਰ ਦੇ ਹਥੋਂ ਖਾ ਬੈਠਾ
ਰਾਂਝਾ ਚੱਲ ਕੇ ਇਹਨਾਂ ਪੈਂਡਿਆਂ ਤੇ,
ਹੀਰ ਤੋਂ ਪਹਿਲੋਂ ਹੀ ਮੌਤ ਵਿਆਹ ਬੈਠਾ
ਉਸ ਰਾਹ ਤੇ ਚਲਣੋਂ ਮਨ ਹੋੜ 'ਗਿੰਦੇ'
ਜਿਥੇ ਪੈਂਡਾ ਹੀ ਪਾਂਧੀ ਨੂੰ ਖਾ ਬੈਠਾ
ਗੁਰਿੰਦਰ ਸਿੰਘ

Friday, February 19, 2010

लहरें / ज्यून तकामी

तूफ़ान आया है
भयानक तूफ़ान
मैं खिड़की से झाँकता हूँ--
ढलान पर खड़ा पेड़
तेज़ लहरों की तरह लहरा रहा है
पेड़ की पत्तियाँ लहरें हैं हमारी इस धरती की
वैसे ही जैसे
लहरें पत्तियाँ हैं समुद्र की
ओ समुद्र की पत्तियों !
तुम्हें याद करता हूँ मैं
जैसे पेड़ पत्तियों को जीवन देता है
वैसे ही समुद्र लहरों को पालता है
तूफ़ान मेरी खिड़की पर थपेड़े मार रहा है
समुद्र है तो तूफ़ान आएगा ही
जीवन है तो तूफ़ान छाएगा ही
ओ हवा के थपेड़ों से लड़ती पत्तियों !
ओ सागर से हमेशा झगड़ती लहरों !
मानव-जीवन भी तुम्हारी तरह है
थपेड़े खाता रात-दिन
रह नहीं पाता उनके बिन

मैं कमज़ोर हूँ / ज्यून तकामी

मैं कमज़ोर हूँ
मैं लड़ नहीं सकता
ख़ुद जीने के लिए मैं दूसरों को
जाल में नहीं फँसा सकता
मैं कमज़ोर हूँ
लेकिन मुझे इतना नीचे गिरने में
आती है शरम
कि कत्ल करूँ दूसरों का
ख़ुद जीने के लिए
मैं कमज़ोर हूँ
लेकिन मुझे इतना नीचे गिरने में
आती है शरम
कि दूसरों के शब्दों को कह सकूँ
अपने शब्दों की तरह
मैं कमज़ोर हूँ
हमेशा सम्भाल कर रखूंगा अपनी कमज़ोरी ।

Thursday, February 18, 2010

बच्चों की दुआ / इक़बाल

लब पे' आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी,
ज़िन्दगी शमा की सूरत हो ख़ुदाया मेरी ।
दूर दुनिया का मेरे दम से अंधेरा हो जाए
हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाए ।
हो मेरे दम से यूँ ही वतन की ज़ीनत,
जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत ।
ज़िन्दगी हो मेरी परवाने की सूरत या रब !
इल्म की शमा से हो मुझ को मुहब्बत या रब !
हो मेरा काम ग़रीबों की हिमायत करना,
दर्दमंदों से, ज़ईफ़ों से मुहब्बत करना ।
मेरे अल्लाह, बुराई से बचाना मुझ को,
नेक जो राह हो, उस रह पे' चलाना मुझ को ।

कह-मुकरियाँ / अमीर खुसरो

१. खा गया पी गया दे गया बुत्ता ऐ सखि साजन? ना सखि कुत्ता!
२. लिपट लिपट के वा के सोई छाती से छाती लगा के रोई दांत से दांत बजे तो ताड़ा ऐ सखि साजन? ना सखि जाड़ा!
३. रात समय वह मेरे आवे भोर भये वह घर उठि जावे यह अचरज है सबसे न्यारा ऐ सखि साजन? ना सखि तारा!
४. नंगे पाँव फिरन नहिं देत पाँव से मिट्टी लगन नहिं देत पाँव का चूमा लेत निपूता ऐ सखि साजन? ना सखि जूता!
५. ऊंची अटारी पलंग बिछायो मैं सोई मेरे सिर पर आयो खुल गई अंखियां भयी आनंद ऐ सखि साजन? ना सखि चांद!
६. जब माँगू तब जल भरि लावे मेरे मन की तपन बुझावे मन का भारी तन का छोटा ऐ सखि साजन? ना सखि लोटा!
७. वो आवै तो शादी होय उस बिन दूजा और न कोय मीठे लागें वा के बोल ऐ सखि साजन? ना सखि ढोल!
८. बेर-बेर सोवतहिं जगावे ना जागूँ तो काटे खावे व्याकुल हुई मैं हक्की बक्की ऐ सखि साजन? ना सखि मक्खी!
९. अति सुरंग है रंग रंगीले है गुणवंत बहुत चटकीलो राम भजन बिन कभी न सोता ऐ सखि साजन? ना सखि तोता!
१०. आप हिले और मोहे हिलाए वा का हिलना मोए मन भाए हिल हिल के वो हुआ निसंखा ऐ सखि साजन? ना सखि पंखा!
११. अर्ध निशा वह आया भौन सुंदरता बरने कवि कौन निरखत ही मन भयो अनंद ऐ सखि साजन? ना सखि चंद!
१२. शोभा सदा बढ़ावन हारा आँखिन से छिन होत न न्यारा आठ पहर मेरो मनरंजन ऐ सखि साजन? ना सखि अंजन!
१३. जीवन सब जग जासों कहै वा बिनु नेक न धीरज रहै हरै छिनक में हिय की पीर ऐ सखि साजन? ना सखि नीर!
१४. बिन आये सबहीं सुख भूले आये ते अँग-अँग सब फूले सीरी भई लगावत छाती ऐ सखि साजन? ना सखि पाती!
१५. सगरी रैन छतियां पर राख रूप रंग सब वा का चाख भोर भई जब दिया उतार ऐ सखि साजन? ना सखि हार!
१६. पड़ी थी मैं अचानक चढ़ आयो जब उतरयो तो पसीनो आयो सहम गई नहीं सकी पुकार ऐ सखि साजन? ना सखि बुखार!
१७. सेज पड़ी मोरे आंखों आए डाल सेज मोहे मजा दिखाए किस से कहूं अब मजा में अपना ऐ सखि साजन? ना सखि सपना!
१८. बखत बखत मोए वा की आस रात दिना ऊ रहत मो पास मेरे मन को सब करत है काम ऐ सखि साजन? ना सखि राम!
१९. सरब सलोना सब गुन नीका वा बिन सब जग लागे फीका वा के सर पर होवे कोन ऐ सखि ‘साजन’ना सखि! लोन(नमक)
२०. सगरी रैन मिही संग जागा भोर भई तब बिछुड़न लागा उसके बिछुड़त फाटे हिया’ ए सखि ‘साजन’ ना, सखि! दिया(दीपक)
21.राह चलत मोरा अंचरा गहे।मेरी सुने न अपनी कहेना कुछ मोसे झगडा-टंटाऐ सखि साजन ना सखि कांटा!
22.बरसा-बरस वह देस में आवे, मुँह से मुँह लाग रस प्यावे।वा खातिर मैं खरचे दाम, ऐ सखि साजन न सखि! आम।।
23.नित मेरे घर आवत है, रात गए फिर जावत है।मानस फसत काऊ के फंदा, ऐ सखि साजन न सखि! चंदा।।
24.आठ प्रहर मेरे संग रहे, मीठी प्यारी बातें करे।श्याम बरन और राती नैंना, ऐ सखि साजन न सखि! मैंना।।
25.घर आवे मुख घेरे-फेरे, दें दुहाई मन को हरें,कभू करत है मीठे बैन, कभी करत है रुखे नैंन।ऐसा जग में कोऊ होता, ऐ सखि साजन न सखि! तोता।।

दोहे / अमीर खुसरो

खुसरो रैन सुहाग की, जागी पी के संग।
तन मेरो मन पियो को, दोउ भए एक रंग।।
खुसरो दरिया प्रेम का, उल्टी वा की धार।
जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार।।
खीर पकायी जतन से, चरखा दिया जला।
आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजा।।
गोरी सोवे सेज पर, मुख पर डारे केस।
चल खुसरो घर आपने, सांझ भयी चहु देस।।
खुसरो मौला के रुठते, पीर के सरने जाय।
कहे खुसरो पीर के रुठते, मौला नहिं होत सहाय।।

जो मैं जानती बिसरत हैं सैय्या / अमीर खुसरो


जो मैं जानती बिसरत हैं सैय्या, घुँघटा में आग लगा देती,
मैं लाज के बंधन तोड़ सखी पिया प्यार को अपने मान लेती।
इन चूरियों की लाज पिया रखाना, ये तो पहन लई अब उतरत न।
मोरा भाग सुहाग तुमई से है मैं तो तुम ही पर जुबना लुटा बैठी।
मोरे हार सिंगार की रात गई, पियू संग उमंग की बात गई,
पियू संग उमंग मेरी आस नई।
अब आए न मोरे साँवरिया, मैं तो तन मन उन पर लुटा देती।
घर आए न मोरे साँवरिया, मैं तो तन मन उन पर लुटा देती।
मोहे प्रीत की रीत न भाई सखी, मैं तो बन के दुल्हन पछताई सखी।
होती न अगर दुनिया की शरम मैं तो भेज के पतियाँ बुला लेती।
उन्हें भेज के सखियाँ बुला लेती।जो मैं जानती बिसरत हैं सैय्या।